पैसे का अंबार, पर प्यार की प्यास: विक्की कपूर की कहानी अमिताभ बच्चन साहब की सदाबहार फिल्म शराबी

 नमस्ते दोस्तों,

आज अचानक पुराने गानों की प्लेलिस्ट सुनते-सुनते 'मंजिलें अपनी जगह हैं' बज उठा, और मैं सीधे 1984 की उस फिल्म की यादों में खो गया जिसने न सिर्फ सिनेमा को एक नया आयाम दिया, बल्कि हम जैसे कई लोगों के दिल में एक अलग जगह बना ली। मैं बात कर रहा हूँ अमिताभ बच्चन साहब की सदाबहार फिल्म **'शराबी'** की।

अक्सर लोग इसे सिर्फ एक 'पियक्कड़' की कहानी समझते हैं, लेकिन सच कहूँ तो मेरे लिए यह फिल्म एक **अकेलेपन की चीख** है। चलिए, आज एक प्रशंसक के तौर पर मैं इस फिल्म की कहानी और इससे जुड़े अपने अहसासों को आपके साथ साझा करता हूँ।

पैसे का अंबार, पर प्यार की प्यास: विक्की कपूर की कहानी


फिल्म की शुरुआत हमें मिलवाती है **विक्की कपूर** (अमिताभ बच्चन) से। विक्की के पास दुनिया की हर सुख-सुविधा है। आलीशान बंगला, महँगी गाड़ियाँ और इतना पैसा कि शायद पीढ़ियाँ बैठ कर खाएं। लेकिन इन सबके बीच एक बड़ी कमी है— **वक्त और ममता।**

उसके पिता, अमरनाथ कपूर (प्राण), एक ऐसे बिजनेसमैन हैं जिनके लिए 'वक्त ही पैसा है'। उन्होंने विक्की को खिलौने तो खूब दिए, पर कभी अपना कंधा नहीं दिया। यहीं से शुरू होता है विक्की का शराब से रिश्ता। वो शराब नशा करने के लिए नहीं, बल्कि उस खालीपन को भरने के लिए पीता है जो उसके पिता की बेरुखी ने पैदा किया है।

जब 'मुंशी जी' बनते हैं सहारा


फिल्म में एक किरदार है मुंशी जी (ओम प्रकाश)। मुझे हमेशा लगता है कि मुंशी जी ही विक्की के असली पिता थे। जब भी मैं विक्की और मुंशी जी के सीन देखता हूँ, मेरी आँखें नम हो जाती हैं। विक्की का अपने पिता को 'सर' कहना और मुंशी जी को अपना सब कुछ मानना, यह दिखाता है कि खून के रिश्तों से बड़े दिल के रिश्ते होते हैं।


प्यार की एक नई किरण: मीना


फिर कहानी में आती है मीना (जया प्रदा)। मीना एक डांसर है, लेकिन विक्की के लिए वो वो इंसान है जो उसे उसकी दौलत के लिए नहीं, बल्कि उसके टूटे हुए दिल के लिए पसंद करती है। विक्की का प्यार बहुत निस्वार्थ है। वो अपनी शराब की लत और अपनी अमीरी के बीच मीना को एक पवित्र स्थान पर रखता है।


> **मुझे आज भी वो डायलॉग याद है:** *"मूँछें हों तो नत्थूलाल जैसी हों, वरना न हों!"* - यह हंसी के पीछे छिपे विक्की के उस फक्कड़पन को दिखाता है जो वो दुनिया को दिखाना चाहता था।


मेरी नजर में यह फिल्म क्या सिखाती है?


'शराबी' सिर्फ शराब के नुकसान या फायदे की बात नहीं करती। यह फिल्म समाज और माता-पिता के लिए एक आईना है। यह बताती है कि:


1. **पैसा सब कुछ नहीं होता:** बच्चों को बैंक बैलेंस से ज्यादा आपके साथ की जरूरत होती है।

2. **इंसान बुरा नहीं होता, हालात होते हैं:** विक्की शराबी जरूर था, लेकिन उसका चरित्र किसी भी 'दूध के धुले' इंसान से कहीं ज्यादा साफ और ईमानदार था।

3. **संगीत रूह की दवा है:** बप्पी लाहिड़ी का संगीत और किशोर दा की आवाज... इनके बिना विक्की कपूर का दर्द अधूरा रहता।


चलते-चलते..

फिल्म के अंत में जब विक्की के पिता को अपनी गलती का एहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है, लेकिन फिर भी एक सुकून मिलता है कि आखिरकार बाप-बेटे का वह फासला मिट गया।


अगर आपने यह फिल्म नहीं देखी है, तो इसे सिर्फ एक कॉमेडी या ड्रामा समझकर मत देखिएगा। इसे विक्की कपूर के उस **दर्द** को समझने के लिए देखिएगा जो कहता है कि दुनिया की सबसे बड़ी दौलत 'अपनापन' है।


आज भी जब विक्की कपूर पर्दे पर लड़खड़ाते हुए चलता है, तो मुझे उसमें एक बिगड़ा हुआ रईस नहीं, बल्कि एक ऐसा बच्चा नजर आता है जो सिर्फ अपने पिता का हाथ पकड़कर चलना चाहता था।

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